इस ब्रह्माण्ड ,सृष्टि को विनाश यानि क्षय से बचाने के लिए ही क्षात्र-तत्व की उत्पत्ति स्वयं श्री मन्न नारायण ने अपने ह्...रदय से की है |इस तत्व के उपासक को ही क्षत्रिय कहा जाता है |हिमालय की कंदराओ में बैठ कर तपस्या को आतुर तत्कालीन क्षत्रिय समाज के प्रतीक अर्जुन को श्री कृष्ण के रूप में श्री हरि ने यह समझाया था कि "ईश्वर द्वारा निर्धारित "सहजं कर्म" यानि जन्म के साथ उत्पन्न स्वधर्म को छोड़ कर यदि कोई मोक्ष के लिए अन्य राह खोजता है ,तो यह उसके द्वारा ईश्वरीय आदेश की अवहेलना मात्र है |जब सत्य और असत्य के मध्य ,न्याय और अन्याय के मध्य,अच्छाई और बुराई के मध्य,धर्मं और अधर्म के मध्य संघर्ष हो, तब कोई तीर्थ या तपोभूमि नहीं बल्कि रणभूमि "धर्म-संग्राम स्थल" ही तपोभूमि होती है |और आज तो पूरी मानव सभ्यता ,और सभी मानवीय मूल्यों का सर्वथा लोप हो चुका है और यह सम्पूर्ण सृष्टि महाविनाश के कगार पर खड़ी है |यह इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि "आज क्षात्र-तत्व सुषुप्त हो चुका है "|अत: इस क्षात्र-तत्व को जागृत करना आज की सबसे बड़ी और कठोर तपस्या है |श्री कृष्ण की यह फटकार भी मिली कि "तुम कैसे भक्त हो जो अपने इष्ट के बताये रास्ते (गीता में ) "स्वधर्म पालन "को छोड़ अपने इष्ट से मिलन ,और मोक्ष के नितांत व्यक्तिगत स्वार्थ में पड़ गए हो ?" आज कि सर्वाधिक आवश्यकता है कि क्षत्रिय अपने धर्म का पालन करे क्योंकि जब क्षत्रिय अपने धर्म का पालन नहीं करता है तब मानव तो क्या देवता ,पशु-पक्षी और कीट-पतंग, तक भी अपने सृष्टि-धर्म का पालन बंद कर देते है ,जिसके परिणाम स्वरूप यह सारी सृष्टि महा-पतन की ओर बढ़ जाती है |
तो क्या आप इस महापतन की और तीव्र गति को रोकने के लिए अपने "सहजं कर्म "यानि जन्म के साथ उत्पन्न स्वधर्म के पालन के लिए आतुर है ?यदि हां तो आपका स्वागत है ,वरन तो अपना और हमारा समय व्यर्थ न करे ,,,,,,,,,